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सारे चिठ्ठाकार लोग नाराज मई 30, 2006

Posted by kalptaru in Uncategorized.
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आप सारे चिठ्ठाकार लोग नाराज हो रहे हो लगता है मैंने कोई नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है, टोने‍ टोटके ब्लाग शुरु करके, यह तो बस मैंने ऐसे ही शुरु कर दिया, जब मैं छुट्टियों पर घर आया तो धार्मिक चैनल आस्था, संस्कार, साधना आदि में ये सब दिया जा रहा था, मैंने सोचा कि जब इनकी दुकान चल रही है तो शायद अपनी भी चल जाये, आप सभी बुद्धीजीवी ब्लागर कृप्या कर मुझे बताऍ कि यह ब्लाग आगे जारी रखा जाये या नहीं, वैसे अब मेरी छुट्टियाँ खत्म हो गईं हैं |

टिप्पणियाँ»

1. उन्मुक्त - मई 30, 2006

सबको अपने विचार रखने कि स्वतंत्रता है, आपको भी| आपको यदि इन पर विशवास हो तो जरूर लिखें| यदि कोई नराज होता है तो गलत होता है|
हम सब (मेरा मतलब सब से है) बहुत सी बातों पर विशवास करते हैं जो कि टोने-टोटके जैसी है| ज्योतिष या हस्त रेखांये सब उसी श्रेणी मे हैं पर कोई अखबार नहीं है या पत्रिका नहीं है जो उसके कालम नहीं रखती हो| टीवी मे कभी न कभी हर चैनल इनका प्रयोग करते हैं| सारे शुभ कार्य सब इसी पर होते हैं|
हां कुछ खिलाफ लेख लिखने वालों को तो झेलना पड़ेगा| उनमे से मै भी एक हूं| एक लेख ज्योतिष और टोने टोटके पर लिखूंगा|

2. eswami - मई 30, 2006

आपने सबकी राय जानने की इच्छा प्रकट कर के अपने पाठकों के प्रति जो सम्मान दर्शाया है वो प्रशंसनीय है.

मेरे विनम्र विचार में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ब्लागिंग के मूलभूत नीयमों में संतुलन ढूँढना होगा आपको.

आप किसी सामाजिक या राजनैतिक विषय पर या व्यक्तिगत विषय पर अपनी राय जैसा या मात्र मनोरंजन के लिए कुछ नही लिख रहे. क्या जो लिख रहे हैं उसे सिद्ध या प्रतिपादित कर सकते हैं? क्या यह दावे से या साँक्खिकी के आधार पर कह सकते हैं की ये अनुभूत प्रयोग हैं? इनकी सत्यता का क्या कोई प्रमाण है? और यदी ये अनुभूत प्रयोग हैं तो अपने अनुभव लिखने मे और हर एक पर लागू होने वाले हर एक के काम आने वाले उपाय लिखने में फर्क है.

दैनिक भविष्यफल हर अखबार में मनोरंजन या हल्की-फुल्की सूचना के रूप मे दिया जाता है लेकिन वो किन्हीं समस्याओं का उपाय नही होता. बिना किसी डिस्क्लेमर के या चेतावनी के इस प्रकार की जानकारी देना कितना उचित है इसका निर्धारण करें. आपके पाठक किस आयू वर्ग के हों और जानकारी कितनी विश्वसनीय है इस बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए. अगर आप इस जानकारी के बारे में गंभीर हैं तो आपकी विषय पर आपके अधिकार, योग्यता और क्षमता का निर्धारण कैसे हो? आपके छद्मनाम से तो नही हो सकता है ना!

माना जा सकता है की आपका उद्देश्य “सर्वजन हिताए सर्वजन सुखाए” है – लेकिन ब्लागिंग की विधा, आपकी शैली और सूचना के प्रकार से जुडे अन्य सँवेदनशील मुद्दों को भी आप ही को पूरी जिम्मेदारी से सँभालना होगा.

3. Nitin - मई 30, 2006

मुद्दा फिर से आस्था का है। आपकी आस्था है इस विषय में तो जरुर लिखें लेकिन जैसा स्वामी जी और उन्मुक्त जी ने कहा उचित संतुलन बना कर लिखे।
बेहतर होगा कि एक चिठ्ठा टोने-टोटके से होने वाले गलत असर पर भी लिखे।
कुछ सालों पहले दूरदर्शन पर अंधश्रद्धा निर्मूलन समिती के चलाये कुछ कार्यक्रम देखे थे लेकिन गूगल पर इस से संबधित कुछ नही मिला.

4. उन्मुक्त - मई 31, 2006

नितिन जी
दूर-दर्शन पर जिन प्रोग्राम की बात आप कर रहें हैं वह शायद होनी-अनहोनी था| इस पर बम्बई उच्च न्यायालय ने स्थगन दे दिया था बाद मे सर्वोच्च न्यायालय ने इसे जारी रखा| यह फैसला 1988 AIR SC 1642 मे छपा है| मेरे विचार से यह गलत है क्योंकि वह दूर-दर्शन पर था| सरकार कर रही थी इस बारे मे अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला जो कि Edwards Vs Aguillard 482 US 510 भी देखने लायक है|

टोने टोटके जी
मै आपकी इस भावना का आदर करते हुये कि आप अपना नाम नहीं बतअना चाहते एक बात पूछना चाहूता हूं|
आप तो कोई professional चिठ्ठेकारों लगते हैं आपके चिठ्ठे का हेड इतना सुन्दर बना है कि उतना सुन्दर हेड तो मैने किसी का भी नहीं देखा- नारद जी का भी नहीं| आप ने लिखा है कि, ‘जब मैं छुट्टियों पर घर आया’| हम सब को मालुम है कि केवल एक ही चिठ्ठेकार छुट्टी मे घर आया है कहीं आप … तो नहीं है और भक्तों की टांग खींच रहे हैं … १ अप्रिल निकल गयी है|
आप अगली पोस्ट पर यह अवशय बता दीजये कि आपने वर्ड प्रेस के चिठ्ठे के हेड पर इतना सुन्दर लोगो कैसे लगाया|
मेरा बहउत मन था कि मै …. कि जगह उसका नाम लिख दूं पर मेरी भि कुछ मजबूरी है

5. Nitin Bagla - मई 31, 2006

ब्लाग कोई साहित्यिक पत्रिका नही है, ना ही चन्दा जमा करके चलाया जा रही कोई उपक्रम है..जिसका कि अपने पाठकों के प्रति कोई उत्तरदायित्व बनता हो..आप अपने ब्लाग पर कुछ भी लिखने को स्वतंत्र हैं…
मै नही मानता कि ब्लागिंग का कोई मूलभूत नियम भी होता है, ये तो दिल की बात है, जो मन में आया, जो दिल को अच्छा लगा ,लिख दिया, चाहे वो टोने -टोटके हो, या कविता गज़ल हो या कोई तकनीकी मुद्दा हो..
ब्लागिंग का जन्म ही शायद बेआवाजों को आवाज देने के लिये हुआ था…याने अगर आपकी कविता कोई अखबार /पत्रिका नही छाप रहा है तो आप उसे अपने ब्लाग पे चेंप दो…और सबको झिलाओ…
अब जिसको पढना हो पढे, ना पढना हो नही पढे, लेकिन लिखने पर कोई रोक नही लगा सकता और ना ही लगानी चहिये..
इसलिये मैं यही कहूंगा, कि “अपने दिल की सुनो”..आपको जँचता हो जो करो…और अगर आलोचना होती है, तो खुशी खुशी सुनो/पढो..इसी बहाने चर्चा में तो रहेंगे आप…:)

6. रवि - मई 31, 2006

…आप तो कोई professional चिठ्ठेकारों लगते हैं आपके चिठ्ठे का हेड इतना सुन्दर बना है कि उतना सुन्दर हेड तो मैने किसी का भी नहीं देखा- …

मेरा भी यही कहना है. बंधु अपने प्रोफ़ेशनलिज़्म को समाज सुधार में लगाओ, कोई उपकारी कार्य करो, कुछ ऐसा करो जिससे आपकी आत्मा को शांति मिले और लोगों को राह.

बाकी, समाचार में बने रहने के लिए यह जरिया भी ठीक ही है.. टोने टोटके वाला…

7. Pratik Pandey - मई 31, 2006

मेरी राय है कि अगर दूसरों के कहने पर आप ब्लॉग बन्द कर रहे हैं, तो ऐसा क़तई न करें। ख़ुद सोचें, सिर्फ़ अपने विवेक पर यक़ीन करें और अगर आपको भी टोने-टोटके अंधविश्वासपूर्ण नज़र आएँ, तो अपना ब्लॉग बन्द कर दें। अगर आपके मन में इस चिट्ठे के प्रति कोई शंका नहीं है और आप समझते हैं कि लोगों में इस विषय की जानकारी बढ़नी चाहिए, तो इसे जारी रखें।

8. Vivek Rastogi - मई 31, 2006

आप सभी चिठ्ठाकारों का शुक्रिया आपकी अमूल्य राय के लिये, और मैंने यह निश्चय किया है कि अब मैं इस ब्लाग को जारी रखूँगा, परंतु कुछ सुधारों के साथ |

9. उन्मुक्त - मई 31, 2006
10. समीर लाल - मई 31, 2006

विवेक भाई

नाराज़गी जैसी तो कोई बात नही.आप को जो अच्छा लग रहा है, आप लिख रहे हैं. हमने तो अपनी बात कही.आप पूर्णरुप से स्वतंत्र हैं, जो लिखना चाहें, जिस तरह से बाकी लोग.बस मर्यादाओं की सीमा रेखाओं का उल्नघन जब तक नही होता, तब तक सब ठीक.अब हमने भी तो टोने टोटके के विरोध मे या व्यंग मे, अपने मन की ही तो लिखी….:)

11. विवेक रस्तोगी - मई 31, 2006

समीर भाई,
धन्यवाद, आपको

12. जगदीश - मई 31, 2006

आपका नाम ही विवेक है, इस नाम को ही सार्थक करें और सुनें सब की करें अपने विवेक के हिसाब से।

13. vijay wadnere - जून 1, 2006

मेरे दोस्तों,

मैने बहुतों की टिप्पाणियों में एक बात पढी – “…मर्यादा, सीमा, उल्लंघन इत्यादि..”, मगर क्या कोई मुझे बतायेगा कि विवेक जी के पूरे ब्लाग में किसी ने भी ऐसी कोई बात देखी क्या?? अगर हो तो कृप्या मुझे कड़ी दीजिये, देखुं तो, मैं कैसे चुक गया उससे!

बहरहाल, विवेक भाई, मैने एक बात परिचर्चा में भी कही थी, आज यहाँ फ़िर कह रहा हूँ, कि आप लिखें, जितना और जो मर्जी लिखें (हम कौन खाँमखाँ?)…
हाँ, अपने “टोने टोटके” के पीछे का कुछ बैकग्राऊंड भी दें तो सोने पे सुहागा.

अब ये कोई ऐसी तो बात है नहीं कि आप खुद बैठते हो और प्रयोग कर कर के नये टोटके बना रहे हों, जहाँ तक मैं समझता हूँ, आप तो शायद प्रचलित चीजें ही एक जगह पर परोस रहे हैं, तो, थोड़ी सी खोजबीन तो बनती ही है – कि वैसा करने के पीछे क्या तात्पर्य है, क्या इतिहास है इत्यादि.

मैं कहता हूँ कि अगर कुछ लॉजिकल रिज़न मिलेगा तो पढने वालों को भी रुचि रहेगी, भले ही वे उसे ना माने और ना ही उसका प्रयोग करें.

14. यश (Software Developer) - मई 8, 2007

सारा विश्व अर्थात सभी धर्म व देश के लोग कभी न कभी इस तरह के कार्य करते है॔ जिसे सामान्यतया काला जादू कहते हैं जिन्हें इस पर विश्वास नहीं है वे या तो USA या दक्षिण अमेरिका अफ़्रिका जाएँ और देखें या फिर पास ही छत्तीसगढ़ में बस्तर जाएँ फिर इसके विरोध में कुछ कहें

शक्ति शक्ति है अच्छी या बुरी नहीं होती । ये हमारे विचार ही सकारात्मक या नकारात्मक होते हैं.

इसमें कोई अंधविश्वास नहीं है मै इस बात पर बल देता हूँ
लेकिन कोई भी कार्य करने का सही तरिका होता है अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो उसका फल भी वैसा नही॔ मिलता है
यह आम जीवन आधुनिक विज्ञान और इस तरह के टोने टोटके और पूजा प्रार्थना पर लागु होती है
आज जब अच्छे शिक्षक चिकित्सक एन्जिनिअर नहीं बनते या मिलते हैं तब आप कैसे सही तांत्रिक ओझा या पंडित संपर्क कर सकते हैं।
यह विचार मै अपनी और अपने उन विदेशी दोस्तों (कई देशों के) की ओर से रख रहा हूँ जिन्होंने इसे अनुभव किया है।

15. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह - अक्टूबर 27, 2007

टोने टोटके जारी हो :)

16. Vivek Bais, विवेक बैस - जुलाई 11, 2008

महोदय,
आपका प्रयास निसंदेह सराहनीय है. मेरी मान्यता है की संसार के कण-कण में ज्ञान भरा पड़ा है. हमारी बुद्धि जिस तथ्य के रहस्य को समझ पाती है उसे विज्ञान की संज्ञा दी जाती है तथा जिस तथ्य को भेदने में हमारी बुद्धि सक्षम नही होती उसे अज्ञान की संज्ञा दी जाती है. खैर यह विज्ञान एवं अज्ञान का विषय बहुत गहरा है और इसे चंद पंग्तियों में क्यक्त करना लगभग असंभव कार्य है.
मैं जहाँ तक आपकी बात को समझ पाया हूँ, उससे यह प्रतीत होता है कि टोना-टोटका आज के इस युग में मात्र एक अन्धविश्वाश (अज्ञान) बन कर रह गया है. मैं भी इसे इसी श्रेणी में देखता हूँ, किंतु विचारों कि गहराइयों में जब गोता लगता हूँ तो यह तर्क भी सामने आता है कि कहीं ऐसा तो नही कि हम या हमारा ज्ञान इन टोने-टोटकों के रहस्य को भेदने में आज सक्षम नहीं, इसीलिए इसे महज एक अन्धविश्वाश (अज्ञान) के रूप में परिभाषित कर रहें हैं? जैसे ही यह विचार मन में आता है, मन कि सारी भ्रांतिया दूर हो जाती है.
मैं यह चाहूँगा कि आप इस ब्लॉग को बंद न करें, बल्कि इन टोने टोटकों के पीछे छिपे रहस्य को भी प्रतिपादित करें तो यह अज्ञान भी एक ज्ञान मूर्ति में साकार हो सकता है. निश्चीत रूप से कार्य मुश्किल है किंतु असंभव कुछ भी नही. जानता हूँ शब्दों में किसी कार्य को गढ़ने कि योजना बनाना और उन्हें साकार मूर्त रूप देना, दोनों अलग-अलग बातें है किंतु अब ओखली में सिर डाल हि दिया है तो मुसल से घबराइए मत.
लोगों कि छोडिये जी, जरा सोचिये आज तक ऐसा कोई व्यक्ति हुआ है जिसमें दुनिया वालों ने कोई खोट न निकला हो. इस दुनिया ने तो प्रभु श्रीराम और माँ सीता को नही बख्शा फिर हमारी आपकी तो बात ही क्या है?
लगे रहो अपने इस कार्य में मित्र, बस इसे अज्ञान का रूप न दो, इन टोने टोटकों को विज्ञान कि द्रस्टी से परिभाषित कर दो, फिर देखो दुनिया कैसे आपको सर आंखों पर बिठाती है.
वो कहते हैं न ”है अज़्म तो ख़ुद ढूंढ़ ले, क्यों गैरों से मंजील का पता मांगे है” वैसे भी कुछ करके असफल होना, कुछ न करने से हज़ार गुना श्रेयस्कर है. ”गीरतें हैं घुड़सवार ही मैदान-ऐ-जंग में, वो क्या खाक गिरेंगे जो घुटनों के बल चला करते हैं”
अंत में माँ भारती से आपकी सफलता कि कामना करते हुए, प्रणाम
आपकी टिपण्णी का इंतजार रहेगा………..

जय हिंद

विवेक बैस

17. विवेक रस्तोगी - जुलाई 12, 2008

विवेक जी,

धन्यवाद आपकी टिप्पणी के लिये ।

मैंने सब की टिप्पणियां पढने के बाद ही निर्णय लिया कि शायद कोई इसे समझना ही नही चाहता कि यह सब भी एक साइंस है जो कि हमारी भौतिकवादी दुनिया से कहीं ऊपर है। पर सब इसे अंधविश्वास ही मानते हैं। लेकिन मेरा विश्वास दृ्ढ है तंत्र और मंत्र में। अगर गीता के श्लोक और रामायण की चौपाइयां सत्य हैं तो दुनिया में कुछ भी अंधविश्वास जैसा नहीं है। मैं भगवान श्रीकृ्ष्ण को अपना आराध्य मानता हूं व ये भी सत्य मानता हूं कि श्रीकृ्ष्ण परमेश्वर(Supreme personality of godhead) हैं व बाकी सब भगवान, भगवान समान हैं (Demi God). लेकिन इस तथ्य को भी आम मानुष आसानी से पचा नहीं पाता है।

हरे कृ्ष्णा

18. shelley - दिसम्बर 23, 2008

aap pure viswas ka sath blog jari rakhe. hamare desh me tone totko ka itihas hai. aaj f ganv to ganv shahar me v log inka prayag karte hai.

19. prashant - मई 26, 2010

we are very very sorry for that message

20. मैंने ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ श्रृंखला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क - अगस्त 16, 2010

[...] हो गया। इस कारण इसी की आखरी चिट्ठी ‘सारे चिठ्ठाकार लोग नाराज‘ में दिया है। मेरे विचार से किसी भी [...]

21. s kumar - सितम्बर 3, 2010

totka practically use kiya hua uske side effects kya hue kya nahi clear karna hota hai.. only few totke blog main dene se koi jyotish nahi ban jata hai better reader TONA TOTKA ki book purchase karle usme thousands totke honge nothing in this site and i think its worthless

22. nidhi - नवम्बर 10, 2010

main aap par pura bharosa karti hu aap hume aur gyan dete rehein.

23. Govind - अप्रैल 22, 2011

Sir hamare ghar ke dwar par din mangalwar and braspatiwar ko do totke hue hai kra koi khatra to nahi kya kaye meri patni ko abhi ek ladka hua hai.

24. Subodh - मई 6, 2011

Aap apna maal bech rahe ho, jisko pasand hai wo le. Carry on !


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